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चिंगारियां

आग,आग आग आग ये आग, बहुत अंदर तक जला देती है ये आग, ये आग जो सोने नहीं देती, ये आग जो चैन से बेठने नहीं देती, ये आग जो मुझे मेरा होने नहीं देता, ये आग कुछ करने की ये आग कुछ बनने की, ये आग तुम्हे पाने की, ये आग तुम्हारे हुस्न को पीने की, ये आग रुह को सुकुन देने की ये आग कश्मकश खतम करने की, ये आग खुदद को माफ करने की ये आग खुद को खुद से रीहा करने की ये आग खुद को बदलने की ये आग,ये आग ये आग ये आग शुरु हुई थी कुछ चिंगारियों से, फिर में जैसे जैसे जीता गया, युँ सांसे लता गया और वो चिंगारियाँ आग में तब्दील हो गई, शुरुआत में में जला, फिर एक राबता सा बना, फिर में उसी जलन में मिट्टी की तरह पका, में कोशिश करता था बुझाने की, पर कुछ पाने की हवा फिर जला जाती जिस पल से उठता हूं,आँखे खुलती है तब से जलता हूं और कमबख्त ये सासें और हवा देती है, अब ये लगता है… ये अब कभी नहीं बुझेगी, ये अब कहीं नहीं रुकेगी ये अनंत आग है, में जब मरुंगा,तब भी ये आग जलती रहेगी, मेरा शरीर राख हो जाएगा पर उस राख में भी तुम ये आग पाओगे, ये आग आग ये आग ये आग ये आग ये आग खुद को जिंदा रखने की ~ मुसाफ़िर

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