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में प्यार करने चला तब…

में प्यार करने चला तब सुना की प्यार अँधा होता है, लेकिन जब आँखें खुली तोह पता चला सिर्फ प्रेमी अंधे होते है, समाज नहीं।  ये बात सुनने में जितनी अजीब लगती है उतनी सच है,समाज प्यार से नफरत करता है।  में प्यार करने चला तब मैंने उसकी आँखें देखि,लेकिन में भूल गया की मुझे उसकी जात पूछनी थी… उसकी आँखों ने काफी बातें बयान की लेकिन यह नहीं बताया की वो दलित थे या ईसाई।   में प्यार करने चला तब मैंने उसकी बातें सुनी,लेकिन उसका धर्म पूछना भूल गया…क्या करें, हम प्यार को ही अपना भगवान मान चुके थे।  में प्यार करने चला तब  होंठ देखे,लेकिन उसका लिंग पूछना भूल गया…  हम उतनी बातें नहीं कर पाए जितनी समाज ने हमारे बारे में की।  मैंने जब दलील की, तब मुझसे पूछा गया की तुम प्यार में अंधे हो, तोह क्या पशु से भी प्यार करोगे?मैंने कहा, पशुओं की तरह निष्पक्ष प्रेम करके तोह दिखाओ…  मुझसे कुछ करीबी लोगों ने कहा, की यह सब हम नहीं, यह सब समाज कहता है, हम तोह तुम्हारा भला ही चाहते है। लकिन वही कुछ करीबी लोग भूल गए की समाज के नाम पे वे खुद ही समाज बन बैठे थे।  आखिर में यह फैसला हुआ  की में चुप रहूँगा तोह वो भी चुप रहेंगे।  में बेवक़ूफ़ नहीं, में अँधा था।  अगर ज़िन्दगी की भी user manual आती तोह में ये समाज के नियम पढ़ लेता, सचेत रहता। लेकिन इतना नास्तिक हो गया था की धर्म के ये ग्रन्थ मेरे पल्ले ही नहीं पड़ते।  जब पढ़ा तोह पता चला की सारे ग्रन्थ एक ही बात कर रहे थे, लेकिन शायद लोगों ने अनदेखा कर दिया होगा।  मैंने कहा, अब अँधा कौन है? काश मेरे प्यार के माइनों को भी ऐसे ही यह लोग अनदेखा कर देते।   क्यूंकि जब,मैं प्यार करने चला तब मुझे पता चला, की मुझे लोगों का स्वीकार नहीं चाहिए,मेरे लिए उनकी ना – मौजूदगी ही जन्नत है।

-Written by Manas Daxini

-This piece was performed by Manas Daxini at ‘Let’s Talk Gender’ open mic which was organized by Nathi Nonsense in collaboration with Radio Nazariya 107.8 FM.

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