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सुकून

मुझे हमेशा से तुम्हारे न होने का डर सताया करता था।

एक अजीब सी घबराहट होती थी ये सोच कर की तुम नही होगी तो क्या होगा।

कभी कभी तो डर के मारे मेरे रोंगटे खड़े हो जाते थे।

एक दफा आफिस में काम करते करते मैं खिड़की के बाहर देखने लगा

और सोच में डूब गया तुम्हारी, तुम्हारे न होने की।

अतुल जब चाय लेकर आया तो उसने पूछा, “भैया, कहाँ खो गए हो?”

मैंने हंस कर कह दिया, “कहीं नही”।

उसके जाने के बाद पता नही कितनी देर तक मैं खिड़की के बाहर देख रहा था।

पड़ी पड़ी मेरी चाय भी ठंडी हो गई, सो मैं उसे एक घूँट में पी कर वापस काम करने की कोशिश में लग गया।

और पिछले हफ्ते घर लौटते वक़्त मैं अपनी गली छोड़ कर अगली गली में चला गया।

वो तो जब किसी ने आवाज़ लगा कर पूछा की इस ओर कैसे, तब पता चला कि मैं सच में खो चुका था।

रास्ता नही, अपना होश, और कहीं हद तक अपने आप को भी।

तुम्हारे न होने का डर मुझे काफी सता रहा था।

तंग आ गया था मैं एक ही चीज़ सोच सोच कर।

ऐसा लगता था मानो जैसे सर का वजन आधा किलो और बढ़ गया हो।

कुछ भी करना मुश्किल हो गया था।

न तो मैं ठीक से पढ़ पा रहा था, न ही ठीक से लिख पा रहा था।

और काम में तो बिल्कुल ही मन नही लग रहा था।

फिर एक दिन वही हुआ जो नही होना चाहिए था।

तुम्हारा ना होना सच हो गया।

और वो ऐसे नही हुआ जैसे सूरज शाम होते होते धीरे धीरे ढलता है, बल्कि कुछ ऐसे हुआ जैसे एक गर्म उजाले दिन में अचानक से बारिश आ जाती है, और हमारे पास उस बारिश से बचने के लिए न तो छाता होता है और न ही छत।

खैर, तुम नही हो अब यहां पर। पता नही कहाँ हो।

मगर तुम्हारे न होने से कम से कम एक चीज़ अच्छी हुई है।

एक अजीब सा सुकून महसूस होता है मुझे,

तुम्हे खोने का डर जो नही है अब।

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-Written by: Purvang Joshi

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